आज पर्यावरण दिवस है। हम पर्यावरण की बात करते-करते अक्सर इसके कुछ मुद्दों पर बहस-मुबाहसे में खो जाते हैं। वर्षों से पर्यावरण राग अलापते-अलापते काफी लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित जरूर हुआ है और सरकार ने भी पर्यावरण बचाने की गरज से कुछ कदम उठाए हैं लेकिन लगता है अब भी पर्यावरण की केवल चर्चा होती है। हमें पर्यावरण राग अलापने के बजाय प्रकृति को बचाने के लिए पर्यावरण का पाठ पढ़ना चाहिए। और, वह भी ‘प से पर्यावरण ’ के स्तर पर। यानी, समस्या की जड़ से।
और, इस जड़ के बारीक रेशे प्रकृति में गहराई से फैले हुए हैं। बड़े-बड़े मुद्दों पर माथे में बल डाल कर सोचते समय हमें प्रकृति की गोद को याद करना चाहिए। जब तक हम समग्र रूप से उसे नहीं समझेंगे, तब तक हम उससे जुड़े भारी-भरकम मुद्दों को भी नहीं समझेंगे। बल्कि, ऐसी बहसों में खो जाएंगे कि कौन-सा देश यह धुंवा फैला रहा है? किसके कारखाने ज्यादा जहर उगल रहे हैं? किसकी गाय-भैंसे हवा में अधिक मीथेन घोल रही हैं? और, यह भी कि किस देश के चूल्हों से सबसे ज्यादा धुवां उठ रहा है?
इसके बजाय अगर हम ‘प से पर्यावरण’ के मूल पाठ को सीधे प्रकृति की पुस्तक में पढ़ें तो समस्या को साफ समझ सकते हैं। और, यह भी समझ सकते हैं कि मां प्रकृति का हाथ हमारे सिर पर क्यों बने रहना चाहिए। अन्यथा, हम जमीन के हर हिस्से को कंक्रीट की इमारतों में बदल देंगे और प्रकृति को उजाड़ कर अपने लिए लगातार समस्याएं पैदा करते रहेंगे।
इस बात को लखनऊ प्राणि उद्यान के एक छोटे से उदाहरण से समझाना चाहूंगा। अस्सी के दशक में एक दिन वनस्पति प्रेमी श्री डी.पी.सिंह और मैं गर्मियों की भरी दुपहर को नरही की गलियों से निकल कर पैदल उद्यान में पहुंचे। वहां हम पेड़ों को देख कर बहुत खुश हुए। इसलिए कि वे अपना नाम बता रहे थे। हर पेड़ पर मानो आई-कार्ड टंगा था। वहीं एक बोर्ड में लिखा हुआ थाः ‘क्या आप मेरा नाम जानते हैं? हम आपको सांस लेने के लिए हवा देते हैं, शीतल छांव देते हैं। फल, फूल, चारा, ईंधन और इमारती लकड़ी देते हैं। वर्षा लाते हैं। पशु -पक्षियों और कीट-पतंगों को आश्रय देते हैं।…और, आप हमारा नाम भी नहीं जानते? ’
इस इबारत को पढ़ने के बाद हम हर पेड़ को पहचानते रहे। उनके नाम याददाश्त में टटोल कर बोलते रहे कि अचानक एक पेड़ दिखा जिस पर नाम की पट्टी नहीं टंगीं थी। इससे हमें बैचेनी हुई। डी.पी. सिंह जी ने कहा-यह विलायती कीकर है, बल्कि आस्ट्रेलिया का। वानस्पतिक नाम है- अकेसिया आॅरिकुलिफाॅर्मिस। इस पर पीले फूल आते हैं। लेकिन, इसका नाम क्यों नहीं लिखा है?
मैंने कहा, उद्यान के निदेशक श्री रामलखन सिंह हैं। चलिए उनसे पूछते हैं। वे घर के बाहर ही मिल गए। जब हमने उन्हें बताया कि उस पेड़ पर नाम क्यों नहीं लगा है, तो बोले-पता नहीं लग पाया। श्री सिंह ने एक कागज पर नाम लिख कर दिया। वे बहुत खुश हुए और बोले तुरंत लिखवा कर नाम लगवा दूंगा।
उनके साथ पास में ही घूम रहे थे कि प्रकृति की गोद का अद्भुत उदाहरण दिखा। एक जगह छोटा-सा बोर्ड लगा था- ‘हेबीटेट’ यानी आवास। जमीन में एक पाइप से पानी का हलका रिसाव हो रहा था। पतली-सी फुहार छूट रही थी। उसके चारों ओर ईट-पत्थर रख दिए गए थे। वहां हरी दूब और घास उग आई थी। पत्थरों के घेरे से बाहर पैदल रास्ते की धूल थी। मैंने पूछा, ‘‘ यह क्या है?’’
रामलखन सिंह हंसते हुए बोले, एक दिन मैंने देखा, यहां पाइप से पानी की बूंदें टपक रही थीं। मैंने वहां पर गोलाई में कुछ ईंटें रख दीं। एक रोज देखा, वहां दूब उग आई है। फिर हरियाली फैलने लगी। वहां चिड़ियां आकर बैठने लगीं। हरियाली बढ़ती गई। आसपास घास भी उग आई। तब कीट-पतंगे सैर पर आने लगे। चींटियों की फौज भी पास से निकलने लगी। इस तरह यह जगह अनेक नन्हे जीवों का आवास बन गईं।
तभी मैंने देखा, कुछ दूरी पर एक गौरेया आकर स्नान करने लगी। दो-एक तितलियां भी चक्कर लगा गईं। सचमुच, एक बेकार, रूखी-सूखी जगह जीवों की बसासत का आधार बन गई। प्रकृति ने उन जीवों को अपनी गोद में शरण दे दी। इसी संवेदना, इसी स्तर से, अगर हम में से हर कोई पर्यावरण का पाठ पढ़े तो हमारा पर्यावरण बचा रहेगा।


आपके संदेश