बड़ा बसंता आज (26 अप्रैल) फिर आया। सामने ऐलेस्टोनिया के कटे-छंटे पेड़ की हरीभरी डाली पर बैठा बोलने लगा- कुटरू…कुटरू…कुटरू….कुटरू!
इस वर्ष वसंत ऋतु से बसंता आसपास के पेड़ों पर कई बार आ चुका है। आवाज सुनते ही तेजी से बाहर निकल कर देखने की कोशिश करता हूं। वह डाल पर हरी पत्तियों के बीच बैठा अपनी कुटरू-कुटरू की आवाज में चहकता रहता है लेकिन अक्सर पत्तियों के बीच दिखाई नहीं देता। आसपास कोई है जान कर चुप हो जाता है। अन्यथा, बोलते-बोलते थकता ही कहां है! एक ही बार में 4 से लेकर 42 बार तक उसकी कुटरू-कुटरू तो मैं सुन चुका हूं। सुबह, शाम और दिन में भी कई-कई बार आसपास या कहीं दूर से उसकी आवाज सुनाई देती है। बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी, मुंबई के निदेशक असद आर. रहमानी ने ठीक ही लिखा है कि इसे जितना सुना गया है, उतना देखा नहीं गया है।
17 मार्च से पहले मैंने भी सिर्फ इसे सुना था। बल्कि वसंत और ग्रीष्म में वर्षों से सुनता आ रहा हूं। पिछले साल इन्हीं दिनों हलद्वानी (उत्तराखंड) में था तो आसपास शीशम के पेड़ों से दोपहर और शाम को लगातार एक सुर में इसकी कुटरू…कुटरू…कुटरू की आवाज सुनाई देती थी। मुझे पता था, वसंत और ग्रीष्म ऋतु इसकी प्रणय की ऋतु है। लेकिन, हैरानी इस बात पर होती है कि कुटरू…कुटरू…कुटरू जैसी सरल और एकरस भाषा में भी इसकी प्रेयसी इसके प्रेम का संदेश समझ लेती है! किसी और हरे-भरे पेड़ की डाली से जवाब देती है’ कुटरू….कुटरू…कुटरू! सीधी सरल भाषा में दिल की कही वे दोनों समझ लेते होंगे। इनके लिए भी शायद ‘सूधो सनेह को मारग है’। जो भी हो ‘खग ही जाने खग की भाषा।’
17 मार्च को बड़ा बसंता को गौर से देखने का मौका मिला था। मैना से थोड़ा बड़ा लगा था। पीली-नारंगी मोटी, मजबूत चोंच। सिर से छाती और आधी पीठ तक भूरा, जिस पर सफेद धारियां पड़ी थीं। पंख और शरीर का निचला हिस्सा हरा। इसीलिए हरी पत्तियों के बीच आसानी से नहीं दिखाई देता।
बसंता के यहां आसपास आने का क्या कारण हो सकता है? चारों ओर फैली सीमेंट-कंकरीट की इमारतों में रहने वाली बेरुखी दिखाती हमारी आदम जाति से तो उसका क्या लगाव होगा? लेकिन, बरगद, आम, शहतूत और दूसरे पेड़-पौधों से लगाव हो सकता है। पीर की मजार पर विशाल पीपल खड़ा है। वहां जरूर दूसरी चिड़ियों के साथ यह भी रसीले फलों की दावत में शामिल होता होगा। गेट पर बरगद का जवान पेड़ भी खड़ा है। बगल में शहतूत है। इन पेड़ों से भी इसकी दोस्ती होगी। इनमें इसे शरण भी मिलती है और भोजन भी। फुरसत में वहां से आकर हमारे आसपास भी अपने प्यार के दो बोल बोल जाता है- कुटरू….कुटरू!
हमारा भी प्यार लेना बसंता। फिर आना।


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