तो सुनो, एक दिन क्या हुआ कि बाज्यू ने काकड़ की कांक्-कांक् की आवाज सुनी। जानते हो , काकड़ खाली नहीं बासता (बोलता) है। श्यूं-बाघ आसपास होने पर बासता है।’’
‘‘हां, कार्बेट ने भी अपनी किताब में लिखा है कि बाघ वगैरह देख कर काकड़ बोलने लगता है,’’ मैंने कहा तो उन्होंने अपना किस्सा आगे बढ़ाया , ‘‘बाज्यू ने कांक्-कांक् सुनी और बंदूक लेकर काकड़ मारने निकल पड़े। अब , शिकारी जंगल में कैसे दबे पांव चलता है , यह तुम जानने ही वाले हुए। पैर से पत्ता भी नहीं खड़कना चाहिए।…तो , बाज्यू काकड़ की आवाज की सीध में चल पड़े। जब वह दिख गया तो नजर काकड़ पर टिका दी। एक पेड़ के मोटे तने का सहारा लेकर काकड़ पर निशाना साधा। फैर (फायर) करने ही वाले थे कि किसी ने पंजे से बंदूक की नली नीचे कर दी। उनका ध्यान तो काकड़ पर था। तने के दूसरी ओर बाघ बैठा ठैरा! उसके मन में जाने क्या आया कि पंजा रख कर नली झुका दी। पता नहीं, कोई लकड़ी समझी भलै , बेल समझी भलै , कौन जाने। वह भी चुपचाप काकड़ का द्वाबा (घात में) लगा होगा। उसकी भी नजर एकटक काकड़ पर हुई। बंदूक की नली उठी तो उसे अलज्याट (रुकावट) लगा होगा और काकड़ से नजर हटाए बिना उसने पंजे से नली धीरे से नीचे झुका दी होगी। बाज्यू हैरान कि ये क्या हुआ? किसने झुकाई नली? बगल में जो देखा तो बाघ बैठा ठैरा गुस्से में। एक शिकार , दो शिकारी! बाघ तो शायद पहले से बैठा था। शिकार पर इतना ध्यान था कि उसे बाज्यू का पता ही नहीं लगा।
‘‘तो फिर क्या हुआ? ’’ मैंने पूछा।
‘‘हुआ क्या , बाघ ने शायद सोचा- यह मार देता है। बाज्यू को लगा , बाघ मार देता है। महराज , बाघ चट्ट से झपटा और पंजों से बांया कंधा और सिर पकड़ कर बाज्यू की पीठ जकड़ ली। उसके वजन से बाज्यू झुके तो बंदूक की नली मिट्टी में घुस गई। ढालू जगह थी। पैर मिट्टी में फिसले और पीठ पर बाघ समेत खस्स नीचे को कखसकते चले गए। खिसकते-खिसकते बांज की एक टहनी हाथ में आ गई। झटके से रुके , पीठ को छटकाया तो बाघ उछल कर कूदा और चलता बना। बाज्यू घायल हो गए। सिर , कंधे और पीठ पर बाघ के नाखूनों से गहरे घाव बन गए। खुन्यौल (खून ही खून) हो गई। फिर भी , हिम्मत करके उठे। जैसे-तैसे नीचे गधेरे तक आए। वहां एक औरत कपड़े धो रही ठैरी। बाज्यू बताते थे, उन्होंने औरत से कहा- यहां से चले जावो। बाघ है यहां। लेकिन , बिखरे बाल और खून से रंगा मुंह देख कर वह उन्हीं से डर गई। गांव जाकर लोगों से कहा , ‘गधेरे में कोई बौला (पागल) घूम रहा है , खून से लथ-पथ।’ लोग देखने आए तो देखा बाज्यू घायल पड़े हैं। तब जो उन्हें ऊपर गांव में लाए।’’
‘‘फिर क्या अस्पताल ले गए? ’’
‘‘घोत्य लि गईं अस्पताल! कहां का अस्पताल , कैसा अस्पताल। अस्पताल-हस्पताल कुछ हुआ ही नहीं। घावों पर रिख-तिती (रीछ की पित्त) लगाई। अत्तर (चरस) , गाय का घी , चीनी और जड़ी-बूटी का रस डाला और हो गया इलाज। कुछ महीने खाट पर पड़े रहे , फिर ठीक हो गए।’’
‘‘अच्छा, और वह काकड़? ’’
लो, काकड़ की किसको पड़ी थी तब? बाघ और बाज्यू भिड़ गए और काकड़ जान बचा कर चुपचाप सटक लिया वहां से , ’’ उन्होंने कहा।
‘‘बड़ी डर-भर रहती होगी उन दिनों तो? हमेशा जंगली जानवरों का खतरा रहता होगा? ’’ मैंने पूछा।
‘‘हां , क्यों नहीं? ’’ वे बोले , ‘‘खाली श्यूं-बाघ ही जो क्या हुए , भालू का भी डर होता था।’’
‘‘भालू भी होते थे? ’’
‘‘खूब। सामने उस जंगल में ही कितने जो होते थे। उनसे भी भिडंत हो जाती थी। वहां ठुल ददा (बड़े भाई) ही भिड़ पड़े भालू से।’’
‘‘कैसे भिड़ पड़े? बताइए तो , ’’ मैंने उत्सुकता से पूछा।
वे बोले , ‘‘बताता हूं। चाय पी लो पहले , फिर सुनाता हूं।’’
उन्होंने यह कहा तो सही , लेकिन फिर चाय सुड़कते हुए किस्सा भी सुनाने लग गए….
( कल पढ़िए भालू से भिडंत)

रोमाँचक और रोचक किस्सा। अब भालू से भी मिल लेते हैं।