भारत से भले ही आम दुनिया भर में फैल गया, लेकिन आज भी दुनिया में इसकी सबसे अधिक खेती हमारे देश में ही की जाती है। इसकी एक से बढ़ कर एक किस्में हैं। और, वे एक-दो नहीं हजारों हैं। इतनी कि आम के नाम सुनोगे तो सुनते ही रह जावोगे। मुंह में पानी भर आएगा। तो लो सुनोः दशहरी, चौसा, लंगड़ा, सफेदा, बंबइया, बंगलौरा, गुलाब खास, जर्दालू, फजली, समर बहिश्त चैसा, नीलम, सुवर्ण रेखा, बंगनपल्ली, पैरी, मलगोवा, मल्लिका, अल्फांसो, आम्रपाली…..
समझे दोस्तो? देश के हर कोने में हर किसी के लिए आम की कोई न कोई किस्म जरूर है। उत्तर हो या दक्षिण, पूरब हो या पश्चिम, आम के मौसम में हर जगह आम की बहार आ जाती है। किस्म-किस्म के आमों के किस्से भी बहुत मजेदार हैं। ‘लंगड़ा’ को ही ले लो। भला, लंगड़ा किसलिए? इसलिए कि इस किस्म के आम का पहला पेड़ बनारस में एक लंगड़े फकीर बाबा के घर के पिछवाड़े में उगा था! वहीं से चारों ओर फैला। और, स्वादिष्ट दशहरी? यह लखनऊ के पास मलीहाबाद के दशहरी गांव में पैदा हुआ। इसका, स्वाद इतना अच्छा था कि आम लोगों ने तो इसे मुंह लगाया ही, लखनऊ के नवाबों और वजीरों ने भी इसे गले लगाया। मलीहाबाद तहसील के ही चौसा गांव में लोगों ने जब पहली बार एक अलग स्वाद और सुगंध वाला आम चखा तो उसका नाम ‘समरबहिश्त चौसा’ रख दिया! और, जानते हो फजली क्यों कहलाया? कहते हैं, बिहार के भागलपुर गांव में एक औरत थी-फजली। पहली बार उसी के आंगन में फला-फूला था यह आम। इसे पालने-पोसने वाली फजली के नाम पर यह फजली कहलाया। भागलपुर गांव से यह पूरे बिहार में ही नहीं, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और पंजाब तक फैल गया।
दोस्तो, फल-फूलों में कलम लगाने की कला सदियों पुरानी है। इस कला ने किस्म-किस्म के आम पैदा करने में आदमी की बड़ी मदद की है। मुगल बादशाहों के जमाने में आम की खूब कलमें बांधी गईं। लेकिन, आज कलम बांधने की कला में कमाल कर हैं, मलीहाबाद के हाजी कलीम उल्ला खान। सत्तर वर्ष के हाजी साहब को इस हुनर के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। दोस्तो, तुम्हें यह जान कर आश्चर्य होगा कि वे कलम लगा कर आम के एक ही पेड़ में 300 किस्मों के आम पैदा कर चुके हैं! और, वे चाहते हैं कि अपने जीवन में वे एक पेड़ से ढाई हजार किस्मों के आम पैदा कर दिखाएं। आओ, उनके जीवट को सलाम करें।
जानते हो, आम कितने वर्ष तक जी सकता है? पचास-पचपन वर्ष पहले चंडीगढ़ के बुड़ैल गांव में आम का एक विशाल पेड़ था। उसकी उम्र 100 वर्ष से भी अधिक थी। उसका तना 9-75 मीटर मोटा था और पेड़ 2,258 मीटर क्षेत्र में फैला हुआ था। एक साल में उससे करीब सोलह-सत्रह टन फल मिलते थे। अच्छा, एक बात सुनो दोस्तो। इस पेड़ का पता प्रसिद्ध वैज्ञानिक और लेखक डॉ. एम.एस.रंधावा ने लगाया था। तुम भी देखना, कहीं तुम्हारे आसपास भी आम का ऐसा कोई विशाल बुजुर्ग पेड़ तो नहीं है? अगर है, तो हमें भी बताना। फिलीपींस में भी आम का एक ऐसा ही 100 वर्ष से अधिक उम्र का पेड़ था जो हर साल दस से पंद्रह हजार फल देता था। एक साल तो उसमें 35,000 फल लगे। वह पेड़ 1,350 वर्ग मीटर में फैला हुआ था।
विदेशी लोग यह देख कर हैरान रह जाते हैं कि किस्म-किस्म के खट्टे-मीठे आमों का स्वाद हम किस-किस रूप में चखते हैं। कच्चे आम की चटनी और अचार बना लेते हैं। पके हुए देशी आम को मजे से चूस लेते हैं और कलमी आम को सफाई से काट कर सलीके से खाते हैं। लू की लपटों से बचने के लिए आम का ‘पना’ बना लेते हैं तो पके फलों को दूध में घोट कर मैंगो शेक, तैयार करते हैं। आम के रस और गूदे के अमावट यानी आम-पापड़, अंबापोली और आम-पट्टी बना लेते हैं। आम का स्क्वैश, जैम, जेली और मुरब्बा भी बनाया जाता है। आम में विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘सी’ और कई खनिज होते हैं।
दोस्तो, आम का सीजन आ गया है। बाजार में किस्म-किस्म के आम आने लगे हैं। चलो, इस बार जम कर इनका स्वाद चखें।


आम के बारे में पढ़कर मुँह में पानी आ गया। आम इतना खास है यह तो मालूम ही न था।
mai hazi kalim ulla khan sab ko salam karta hu jinone 1 hi ped par 300 kism ke aam paida keye