बाजार में मक्का के मुट्टे आ गए हैं। सड़कों के कोने पर रेढ़ी में रख कर या फुटपाथ पर बैठ कर भुट्टे वाले भुट्टे भून कर बेचने लगे हैं। इस मौसम में भुना हुआ भुट्टा आज पहली बार खाया। इसमें न वसा है, न इसे तला जाता है। इसलिए ‘फैट’ का कोई चक्कर नहीं। कोयले के अंगारों पर तपा हो, उबला हो या पॉपकॉर्न के रूप में हो- मक्का का अपना अलग-अलग स्वाद है।
भुट्टे पर जड़े मोती जैसे दाने बहुत आकर्षक लगते हैं। प्रकृति ने इन्हें किस सफाई के साथ कतारों में जड़ दिया है! अमीर खुसरो ने शायद इन्हीं मोतियों पर मोहित हो कर लिखा होगाः
हरी थी मन भरी थी लाख मोती जड़ी थी
राजा जी के बाग में, दुशाला ओढ़े खड़ी थी
शुरु में हो सकता है इसे राजा जी के बाग में उगाने लायक नायाब फसल ही माना जाता रहा हो क्योंकि यह फसल हमारे देश में पुर्तगाली लाए। यानी, पुर्तगालियों के आने से पहले तक हम इसे नहीं पहचानते थे। लेकिन, सन् 1966 में जब मुझे पूसा इंस्टीट्यूट, नई दिल्ली में मक्का अनुसंधान परियोजना में अनुसंधान कार्य करने का मौका मिला तो पता लगा, प्रसिद्ध मक्का प्रजनक डॉ. एन. एल. धवन और डॉ. आर. एल. पालीवाल ने सिक्किम में आदिम मक्का की खोज की है। यानी, दक्षिणी अमेरिका के अलावा मक्का का एक और जन्म स्थान है- भारत।
उन्हीं दिनों पड~र्यू यूनिवसिर्टी के डॉ. मर्ट्ज ने मक्का की कुछ दक्षिण अमेरिकी प्रजातियों में लाइसीन एमिनो अम्ल की अधिक मात्रा की खोज की थी। उनके बीज प्रोटीनबहुल किस्मों के प्रजनन के लिए मंगाए गए थे। वैज्ञानिकों को आशा थी कि उच्च लाइसीन का यह जीन मक्का की किस्मों में डाल कर उसकी पोषकता बढ़ा दी जाएगी। तीसरी दुनिया के तमाम अविकसित और विकासशील गरीब देशों में मक्का लोगों का मुख्य भोजन है। इसका मतलब प्रोटीनबहुल मक्का लाखों लोगों को कुपोषण से बचा सकेगी। बाद में इसकी प्रोटीनबहुल‘‘प्रोटीना’ आदि किस्में तैयार भी की गईं लेकिन उनके कोमल दाने हमारे देश के कीड़ों को भी खूब पसंद आए। उपज और रोग व कीटों का प्रकोप सहने में ये किस्में मक्का की अन्य संकर व संकुल किस्मों के मुकाबले पीछे छूट गईं।
एक और महत्वाकांक्षा थी मक्का अनुसंधानकत्ताओं की, कि सिक्किम की कई भुट्टों वाली आदिम प्रजाति का यह जीन नई किस्म में डाल दिया जाए तो मक्का खूब फलेगी। एक-एक पौधे पर चार-पांच भुट्टे लगेंगे। इस तरह प्रति हैक्टेयर उपज बढ़ जाएगी। हम लोग कुछ वर्ष तक मक्का की किस्मों के ब्याह रचा कर उनकी संतानों में अनेक भुट्टों का यह विशेष जीन डालने के प्रयास करते रहे। लेकिन, लगता है भुट्टों की संख्या, उनके आकार और अधिक उपज का गणित सही नहीं बैठा क्योंकि ऐसी कोई किस्म खेतों में दिखाई नहीं दी। मैं तीन वर्ष मक्का अनुसंधान कार्य करने के बाद पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में चला गया और वहां ‘किसान भारती’ मासिक पत्रिका के पन्नों पर खेती करने लगा।
(जारी है)


बहुत खूब। कहते हैं 13 हारी यानि 13 श्रंखलाओं का भुट्टा मिलना मुश्किल होता है। और मैने बहुत खोजा भी पर ऐसा भुट्टा मिला ही नहीं। इसके पीछे भी क्या कोई वैज्ञानिक आधार है?