लेकिन, अपनी पिछली बालकनी के लैंपशेड में गौरेया दम्पति के आने का बहुत इंतजार है। सीपियों से बना यह लटकता लैंपशेड न जाने क्यों उन्हें इतना भा गया कि हर साल परिवार बढ़ाने के लिए वे यहां आ जाती हैं। लैंपशेड पर बैठती, झूलती, चिचियाती गौरेयां तिनका-तिनका चुन कर पहले पालना बुनती हैं। अंडे देती हैं। और, नन्हे चूजे निकल आने पर उन्हें चुग्गा चुगाती हैं। चारा-दाना, कीड़े-मकोड़े खोजने एक जाती है तो दूसरी पहरा देती रहती है। बच्चे बड़े हो जाने पर वे उन्हें बाहर लाती हैं। सामने तार पर बैठाती हैं। पर तौल कर उड़ना सिखाती हैं। चहक-चहक कर बोलना सिखाती हैं। और, फिर एक दिन अपने-अपने दम पर दुनिया में जीने का सबक पढ़ा कर वे सभी यहां-वहां उड़ जाती हैं।
इस बार कब आएंगीं गौरेयां? कहीं पास में ही अपने से बड़े कबूतरों का घर-परिवार पनपता देख कर नन्हीं गौरेयां डर तो नहीं गईं?
वैज्ञानिक कहते हैं, गौरेयां अपना इलाका तय कर लेती हैं। उनके जोड़े ने मेरे फ्लैट की बालकनी में लटके लैंपशेड को अपना इलाका घोषित कर दिया है! जब वे यहां होती हैं, हम खिड़की के कांच से चुपचाप उन्हें आते-जाते या बच्चों को चुग्गा चुगाते देखते हैं।
चलो, इस महानगर में कम से कम गौरेया तो साथ हैं जो हर सुबह अपनी चहचहाट से सुबह होने का अहसास करा देती हैं। आदमजात से कितना हिलमिल गई हैं ये। गौरेयां मिलनसार होती हैं, तभी तो सर्दियों में जब इनसे थोड़ा बड़ी प्रजाति की गौरेया प्रवास पर आ जाती हैं तो ये उनसे भी खूब घुल-मिल जाती हैं। ये मनुष्य के साथ मिल कर रहती हैं और गांवों से लेकर शोर भरे शहरों जैसे मुंबई, चेन्नई तथा दूरस्थ रेगिस्तानी गांवों और पहाड़ों में सभी जगह पाई जाती हैं।
मुझे एक मजेदार चुटकुला याद आ रहा है। एक ‘पहुंचे हुए दार्षनिक’ ने देखा कि छोटी-सी गौरेया पंखों के बल पर उड़ रही हैं और गाय पेट भरने के लिए दूर-दूर तक भटक रही है। वे आसमान की ओर देख कर अफसोस के साथ बोले-या खुदा! तूने यह कैसा इंसाफ किया? नन्ही-सी जान गौरेया को तो पर बख्श दिए मगर इस भारी-भरकम जानवर को दर-दर भटकने के लिए छोड़ दिया? तभी, उनके माथे पर उड़ती गौरेया की बीट गिरी। वे हड़बड़ा कर बोले-रब्बा तू इंसाफ पसंद है। तूने ठीक ही गौरेया को पंख बख्शे।इस नन्ही जान को तो देखिए। सब कुछ भुला कर आज भी आदमी के साथ रह रही है। हमें इन्हें अपने लैंपशेड, किताबों की अलमारी के पीछे दीवार की दरार में या मंुडेर के किसी कोने पर घर बसाने देना चाहिए। यों, खबर है कि इनकी तादाद तेजी से घट रही है। शहर की जहरीली हवा, कानफोड़ू शोर, चारे-दाने व पानी की कमी और माइक्रोवेव टावरों से निकली अदृश्य, खतरनाक तरंगे इनकी जान ले रही हैं। इन्हें परिवार बढ़ाने का मौका दीजिए। कंक्रीट के इस जंगल में अगर और वनपाखी न भी आएं तो कम से कम ये नन्हीं गौरेयां तो चहक-चहक कर हमें सुबह जगा ही देंगीं।



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