अहा, हमारी होली भी क्या होली थी!
जब ठींग के धूरे का आरपार फैला वन जगह-जगह बुरोंज के फूलों से लाल होने लगता तो होली आ जाती थी।
पुरखों की बाखली के आंगन में एक ऊंचे निशान पर फागुन की अष्टमी या नवमी को चीर बांधी जाती। ढोल कसा जाता। और, अगले दिन से चीर बंधे ढोल की ढमा-ढम के साथ खड़ी होली शुरू हो जाती। होल्यार गांव के हर घर में जाकर होली गाते थे। हम बच्चे अपना फटे कपड़े का रुमाल वगैरह धो-धोकर साफ कर लेते थे क्योंकि हर घर में गुड़ की शिरनी बंटती थी। हम थोड़ा खाते और थोड़ा रुमाल में बांध लेते। दिन भर होल्यारोंके साथ चक्कर काटते-किसी दिन नीचे टांडा की ओर, कभी कानला, धूरा, कभी हमारे घरों के आसपास और ड्वबारा व घिंगरानी। तब गांव में 70-80 मवासे रहते थे और मकान दूर-दूर थे।
होल्यार मकानों के आंगन में गोल घेरे में घूमते, बैठते, उठते हुए होली गाते थे…
‘शिव के मन माहि बसे काशी
शिव के मन माहि बसे काशी !
आधी काशी में बामन बनिया
आधी काशी में संन्यासी…
शिव के मन माहि बसे काशी !’
या फिर, ‘नदी जमुना के तीर कदम चढ़ि, कान्हा बजै गयो बांसुरिया!’ कभी-कभी लंबी टेक की फाग गाते, ‘तेरे सिर पर पगड़ि, पगड़ि पर तिलक, तिलक पर टीका यार…।’ और, भी न जाने कितने फाग गाए जाते थे।
जाड़ोंकी वर्षा और हिमपात से पनपी गेहूं की फसल उन दिनों घुटने-घुटने ऊंची होती थी। हम लोग फसल से बचते-बचाते एक के बाद एक घर के आंगन में पहुंचते। कानला और धूरा में पास के जंगल के बुरोंजोंका रंग पड़ता था। पत्तियों का हरा रंग भी बनाया जाता था। लेकिन, ज्यादातर पानी से भिगाने का रिवाज था। होली गायन पूरा होते-होते एक आदमी थाली या तसले में गुड़ की भेली के टुकड़े बनाता। उसमें घी लगाता। वह शिरनी सबको बांटी जाती थी। उसके बाद होल्यार अगले घर की ओर चल पड़ते। उन दिनों शराब कोई पहचानता भी नहीं था।
रात में दूकान में बैठक होली होती थी। जोध्यदा को रात की होली गवाने का बहुत शौक था। रात में भी जम कर होली गाई जाती। होल्यारों के बीच चहा के गरमा-गरम गिलास घूमते थे। दिन में फिर घर-घर खड़ी होली। ज्यों-ज्यों दिन आगे बढ़ते होली और ठिठोली बढ़ती जाती। होली के बोल बदल जातेः
‘‘ अछ हां जी देवर, हमरो भरोसो जन करिए !
हमने बोलायो सांझे ही
तुम आए अधरात, देवर हमरो भरोसो जन करिए!’’
छरेटी यानी होली के आखिरी दिन तक तो गाते-गाते कई होल्यारो का गला भी बैठ जाता था। फिर भी वे फाग के रस में डूब कर पूरी ताकत से गाते…
‘उड़ि-उड़ि भंवरा, अंखियन में भैटो
अंखियन को रस लेय, बलम… ’
या
‘झुकि आयो शहर से ब्योपारी
झुकि आयो शहर से ब्योपारी!
इस व्योपारी को प्यास लगी है
पानी पिला दे नथवाली, झुकि आयो…’
जब सभी होल्यार आशीष देने लगते तो सारा माहौल ही बदल जाता। होल्यार हर घर पर आशीष देते…“जी रया, जागि रया लाख बरीष’’…
इस तरह होली का उफान थम जाता और अगले दिन मंदिर में ‘टीका’ मनाया जाता था। हलुवा बनता था और उसका प्रसाद बांटा जाता था। कानों मेंबहुत दिनों तक टुकड़ा-टुकड़ा होली के गीत गूंजते रहते थे।…

welcome ,happy holi
Is sansmaran ko padhana bada achha laga! Sasneh swagat hai!
Bahut khoobsoorteese likha gaya hai yah sansmaran!
अहा, पुरानी होली की याद दिला दी, जब पिसी हल्दी में तिब्बत से मंगाया गया खास सुहागा मिलाकर लाल रंग बनाया जाता था और बांस की पिचकारी बनाई जाती थी।
गांव के पटांगण में पूरा गांव इकट्ठा होता था और गांव के पधान ज्यू सबसे पहले सभी लोगों पर बांश की पिचकारी से रंग डालते थे और उसके बाद सब गांव वाले रंग खेलना शुरु करते थे।
कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,
धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,
कलम के पुजारी अगर सो गये तो
ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।
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