आज, 25 जून जॉर्ज आर्वेल का जन्म दिन है।
क्या किसी को याद है, मोतीहारी, बिहार में 25 जून 1903 को उनका जन्म हुआ था? क्या आज वहां उन्हें कोई याद करेगा?
मोतीहारी में जब वे पिता रिचर्ड वालमेजले ब्लेयर और मां इडा मबेल ब्लेयर के बेटे के रूप में पैदा हुए तो उनका नाम एरिक आर्थर ब्लेयर रखा गया। मोतीहारी में साल भर पालने-पोषने के बाद मां बेटे को लेकर इंग्लैंड चली गई। बड़ा होकर उसने लेखक बनने का सपना देखा और 36 वर्ष की उम्र में अपना नाम जॉर्ज आर्वेल रख लिया। आज विश्व के उस महान लेखक को भला कौन नहीं जानता!
लेकिन, मोतीहारी में हम उसे भूल गए थे। भला हो उन लोगों का जिन्होंने याद दिलाया कि उस महान लेखक का जन्म हमारे देश में मोतीहारी में हुआ था। इसके लिए कुछ स्थानीय लोगों ने आवाज उठाई। जिला प्रशासन को जगाया और आशा है आज वहां जॉर्ज आर्वेल को याद किया जाएगा। याद किया जाएगा कि यह वही बच्चा था जिसने बड़ा होकर‘‘ऐनिमल फार्म’ और ‘‘1984’ (नाइंटीन ऐटीफोर) जैसे कालजयी उपन्यास लिखे।
तब देश में अंग्रेजी हुकूमत थी। इरिक ब्लेयर उर्फ जॉर्ज आर्वेल के पिता सिविल सेवा के तहत अफीम विभाग में काम करते थे। मां बर्मा के एक चाय व्यापारी की बेटी थी। मां ने आर्वेल को इंगलैंड जाकर एक मामूली स्कूल में भरती कराया क्योंकि वह पब्लिक स्कूल का खर्चा नहीं उठा सकती थी। फिर छात्रवृत्ति पाकर आर्वेल ने प्रसिद्ध ईटन कालेज में पढ़ा। पढ़ने के दौरान ही उसने कालेज की पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया था। उसे यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति न मिल सकी। इसलिए उसने इंडियन इंपीरियल पुलिस सेवा की परीक्षा दी और उसमें पास होकर बर्मा चला गया। वहां 1922 से 1927 तक पुलिस मकहमे में सेवा की।
आर्वेल को अंग्रेजी समाज का वर्ग भेद पसंद नहीं था। साम्राज्यवादी शासन भी उन्हें रास नहीं आया। इसलिए उन्होंने सेवा से इस्तीफा दे दिया। सेवा के दौरान उन्होंने अंग्रेज अफसरों का जो व्यवहार देखा उसे अपने निबंधों में उकेरा।‘‘शूटिंग एन एलिफेंट’ (1950) संग्रह और ‘‘ए हैंगिंग’ निबंध में ये रंग देखे जा सकते हैं।
जॉर्ज आर्वेल प्रख्यात अमेरिकी लेखक जैक लंडन के प्रशंसक थे। वे जैक लंडन की ही तरह यहां-वहां भटके और पिछड़े व गरीब इलाकों की खाक छानी। अनुभव बटोरने के लिए उन्होंने तरह-तरह के काम किए। आवारागर्दी की, फाकेमस्ती का आनंद लिया, मामूली मजदूरी के काम किए, होटल में प्लेटें धोईं, यहां तक कि भिखारी भी बने। भिखारी के रूप में उन्होंने अपना छद्म नाम पी. एस. बर्टन रख लिया। मौसमी मजदूर के रूप में हॉप्स की पिकिंग की। जेल का अनुभव जुटाने के लिए एक बार दारू पीकर अपने-आप को गिरतार करवाने का नाटक रचा। लेकिन, दो दिन हवालात में रख कर अधिकारियों ने उन्हें छोड़ दिया। लंदन और पेरिस में उन्होंने गरीबी का जो आलम देखा, उसके आधार पर अपनी पहली पुस्तक‘‘डाउन एंड आउट इन पेरिस एंड लंदन’ (1933) लिखी। उन्हीं दिनों उन्होंने इंगलैंड की एक नदी‘‘आर्वेल’ के नाम पर अपना उपनाम जॉर्ज आर्वेल रख लिया।
लेखन से खर्चा न चल पाने के कारण उन्होंने अध्यापकी भी की। उसी दौरान अपना पहला उपन्यास ‘‘बर्मीज डेज’ (1934) लिखा। आर्वेल ने 1936 में एक डाक्टर की बेटी आइलीन ओ‘शाॅग्नेसी से विवाह किया। उसके बाद चार साल तक लंदन की एक किताबों की दूकान पर पार्ट टाइम असिस्टेंड की नौकरी की। वहां के काम के अनुभवों पर भी उन्होंने आगे चल कर एक उपन्यास ‘‘एस्पिडिस्ट्रा लाइंग’ (1936) लिखा।
आर्वेल समाजवादी विचारधारा में विश्वास रखते थे। सिविल वार में अपनी सेवाएं देने के लिए वे स्पेन गए। वहां मोर्चे पर लड़े। वहीं दुश्मन की एक गोली उनके गले में लगी, लेकिन वे बाल-बाल बच गए। स्पेनी सिविल वार की पृष्ठभूमि पर उन्होंने‘‘होमेज टु कैटालोनिया’ (1938) उपन्यास लिखा।
आर्वेल सफल पत्रकार भी रहे। मोंद, जी.के.‘ज वीक्ली, ले प्रोग्रेस सिविक, न्यू एडेल्फी, न्यू स्टेट्समैन, द आॅब्जर्वर, ट्रिब्यून, आदि पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित होते रहते थे। 1936 में उन्हें प्रकाशक विक्टर गोलेंज ने उत्तरी इंगलैंड में बेरोजगारी के हालात पर लिखने के लिए आमंत्रित किया। उनके ये लेख ‘‘द रोड टु वीगन पीयर’ पुस्तक के रूप में छपे जिसे साहित्यिक पत्रकारिता का अनुपम उदाहरण माना जाता है। 1941 में आर्वेल बी बी सी इस्टर्न सर्विस में काम करने लगे। वे भारत के लिए प्रसारित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों का संचालन करते थे। इस दौरान उन्हें टी.एस. इलियट, डायलन थाॅमस, ई.एम. फास्र्टर और मुल्क राज आनंद जैसे चर्चित लेखकों का सहयोग मिला। बी.बी.सी. में रहते हुए उन्होंने भारतीय प्रसारण के तहत एक साहित्यिक कार्यक्रम ‘वाॅयस’ की शुरुआत की। वे वहां दो वर्ष रहे। उसके बाद ट्रिब्यून के साहित्य संपादक बने।
(जारी है)


मुझे आज ही इस वेबसाइट को देखने का सौभाग्य मिला। बड़ी खुशी हुई। कॉलेज के जमाने में हमें ऑरवेल को पढ़ने का मौका मिला और एनिमल फार्म , 1984 दोनों ही किताबों ने मुझे अपना world view develop करने में मदद दी।
धन्यवाद कृष्ण। आपने मेरा ब्लाॅग पढ़ा। जार्ज ऑरवेल के संघर्षमय जीवन से हम सभी को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। कोशिश करूंगा कि प्रेरणा देने वाली कई नई चीजें पढ़ने के लिए आपको दे सकूं।