मक्का की बात हो और इंका, मय व एज़टैक सभ्यताओं की बात न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? हजारों साल पहले दक्षिणी अमेरिका के इंका और मध्य अमेरिका के मय तथा एज़टैक निवासियों का मुख्य भोजन मक्का ही थी। मक्का उनकी संस्कृति में रस-बस गई थी। शिशु के जन्म से लेकर जीवन भर अनेक सामजिक उत्सवों और धार्मिक अनुष्ठानों में मक्का का प्रयोग होता था। इंका निवासी टिटिकाका झील के आसपास रहते थे। वे मक्का की खेती करने के लिए उत्तरी इलाकों की नदी घाटियों में बस गए। तब इंका, मय तथा एजटैक निवासी पशु नहीं पालते थे। वे खेती के सभी काम स्वयं करते थे। इसलिए जितनी मक्का पैदा होती, वह उनके खाने के काम आती। वे मक्का की रोटी बनाते, उसके दाने पीस कर या उबाल कर खाते। रोटी अक्सर उत्सवों के अवसरों पर बनाते। वे मक्का के कच्चे दाने पीस कर उनका शोरबा बनाते थे और उनमें खमीर उठा कर मदिरा भी तैयार करते थे। वे फसलों की देवी ‘चिकोमिकॉल’ की पूजा करते थे जिसकी प्रतिमा के बांए हाथ में सूरजमुखी से सजी ढाल और दाहिने हाथ में मक्का के दो भुट्टे दिखाए जाते थे। देवी की पूजा के अवसर पर सात कुंवारी कन्याएं सात-सात भुट्टे कंधे पर रख कर पूजा की वेदी तक ले जाती थीं। वे भुट्टे बाद में अन्न भंडारों में रख दिए जाते थे ताकि अन्न भंडार भरे रहें। देवी ‘जिलोमिन’ को कच्चे भुट्टों की रक्षिका मान कर पूजा जाता था।
मय लोग नवजात शिशु की नाल मक्का के भुट्टे पर रख कर काटते थे। भुट्टे के बीजों को बो देते। उस फसल से जो भुट्टे मिलते, उनसे बच्चे के अन्नप्राशन के लिए पहला ठोस भोजन पकाते थे। कुछ बीज बचा दिए जाते जिन्हें बच्चा बड़ा होकर खेतों में बोता था।
इन सभ्यताओं की कला में मक्का के प्रतीक बहुतायत से पाए गए हैं। वे लोग मक्का से मूर्तियां सजाते, बर्तनों पर भुट्टे उकेरते, भुट्टों के भित्ति चित्र बनाते। यहां तक कि बच्चों के मिट्टी-पत्थर के खिलौने भी मक्का से सजाए जाते।
हर घर में मक्का पीसने का सिलबट्टा होता था। कतार में रखे सिलबट्टों पर मक्का के दाने पीसती गृहणियां एक साथ लोकगीत गाती थीं। ऐसे कई सिलबट्टे आज दक्षिणी अमेरिका के संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं।
मक्का चोरों को कड़ी सजा दी जाती थी। राजा के निधन के बाद पांच दिन तक सिल पर मक्का नहीं पीसी जाती थी। मक्का के दानों को सफेद कपड़े पर कौड़ियों की तरह फैंक कर भविष्यवाणी की जाती थी।
मक्का की फसल की कटाई का त्यौहार मनाया जाता था। चुनिंदा भुट्टे कंबलों में लपेट कर पूजे जाते। उन्हें फसल की मां माना जाता था जिसने शेष फसल की रक्षा की। फसल कटते समय भुट्टे के रंग-रूप, भुट्टे में बीजों की कतारों की संख्या बताने के खेल खेले जाते।
कहते हैं इंका, मय और एजटैक सभ्यताएं मक्का पर ही पनपीं और शायद मक्का से ही समाप्त हो गईं क्योंकि मक्का से उन्हें पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिले। और तो और, प्रख्यात वैज्ञानिक जे. बी.एस. हाल्डेन ने भी कहा था कि मक्का पर आश्रित ये सभ्यताएं गेहूं, जौ और चावल पर आश्रित सभ्यताओं के समान नहीं पनप सकीं। विश्व भर के मक्का वैज्ञानिक मक्का के दानों में पोषक तत्व बढ़ाने की आज भी पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।
मक्का के विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक मैंगल्सडॉर्फ की पुस्तक ‘कॉर्न’ (मक्का) के समर्पण में उन्होंने कुछ इस तरह लिखा था, ‘कल लोग कहेंगे कि दुनिया में एक ऐसा खब्ती आदमी भी था जिसने सिर्फ मक्का के पौधे पर काम करते हुए अपनी ज़िदगी गुजार दी, लेकिन इस काम के लिए एक ज़िदगी का समय भी शायद कम है।’
मक्का के बारे में अमीर खुसरो की पहेली पढ़ते समय मुझे उत्तराखंड की बचपन में सुनी यह पहेली अक्सर याद आ जाती हैः
आटनी रे बाटनी
हात ले चुचाट हुंछ
खुकुरी ले काटनी!
यानी, आटनी, बाटनी, हाथ से तोड़ने पर चुचाट की आवाज होती है। इसलिए खुकुरी से काटते हैं। उत्तर है- भुट्टा। यह पहेली कब बनी होगी?


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