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कौन कदंब
वही, जो हमारे प्राचीन साहित्य में श्रीकृष्ण का प्रिय वृक्ष माना गया है। और?, आज हमारे वनस्पति विज्ञानियों की भाषा में ऐंथोसिफेलस कदंबा कहलाता है। संस्कृत हो या हिंदी? बांगला हो या गुजराती और मराठी, इन सभी भाषाओं में यह कदंब ही कहलाता है। इतना ही नहीं? तमिल भाषी भी इसे कदंबा या वैल्लाइ और [...]
सिसुणा
सिसुणा पहाड़ की पहचान है। लोग इसे डंक मारने वाले पौधे के रूप में जानते हैं। इसलिए यह ‘बिच्छू बूटी’ भी कहलाता है। बचपन में शैतानी करने पर खूब सुनने को मिलता था, ‘रुक जा, अभी लगाता हूं सिसुणा!’ छू जाने पर लगता था जैसे सचमुच बिच्छू ने डंक मार दिया हो। सिसुणा की झपक [...]
मंडुवा की रोटीः सिसुणा का साग
हाल ही में पहाड़ गया था। लौटते समय थोड़ा मंडुवा का आटा भी ले आया, इस मोह से कि महानगर में मंडुवे की रोटी खाते समय घर की याद आती रहेगी। याद आती भी रही है। जब-जब मंडुवे की रोटी खाते हैं, मन पंछी उड़ कर घर के खेत-खलिहानों में पहुंच जाता है। मंडुवे की [...]
पर्यावरण का पाठ
आज पर्यावरण दिवस है। हम पर्यावरण की बात करते-करते अक्सर इसके कुछ मुद्दों पर बहस-मुबाहसे में खो जाते हैं। वर्षों से पर्यावरण राग अलापते-अलापते काफी लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित जरूर हुआ है और सरकार ने भी पर्यावरण बचाने की गरज से कुछ कदम उठाए हैं लेकिन लगता है अब भी पर्यावरण की केवल [...]
भुट्टे आ गए हैं-2
मक्का की बात हो और इंका, मय व एज़टैक सभ्यताओं की बात न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? हजारों साल पहले दक्षिणी अमेरिका के इंका और मध्य अमेरिका के मय तथा एज़टैक निवासियों का मुख्य भोजन मक्का ही थी। मक्का उनकी संस्कृति में रस-बस गई थी। शिशु के जन्म से लेकर जीवन भर अनेक [...]
भुट्टे आ गए हैं
बाजार में मक्का के मुट्टे आ गए हैं। सड़कों के कोने पर रेढ़ी में रख कर या फुटपाथ पर बैठ कर भुट्टे वाले भुट्टे भून कर बेचने लगे हैं। इस मौसम में भुना हुआ भुट्टा आज पहली बार खाया। इसमें न वसा है, न इसे तला जाता है। इसलिए ‘फैट’ का कोई चक्कर नहीं। कोयले [...]
पक गए होंगे काफल-2
यह सब तो ठीक, लेकिन वह चिड़िया क्यों कहती है, ‘‘ काफल पाक्को! काफल पाक्को!’’ दिन भर रट लगा देती है, बल्कि कई बार तो रात में नींद खुलने पर भी उसकी आवाज आती रहती है, ‘‘ काफल पाक्को! ’’ वह सोती नहीं क्या? सोती है। लेकिन, ज्यादातर समय लगातार बासती (बोलती) रहती है, ‘‘काफल [...]
पक गए होंगे काफल-1
मेरे गांव के खेतों और वनों में रसीले, लाल काले काफल पक गए होंगे। गांव के बच्चे और बहू-बेटियां गेहूं के ‘नौल’ से बनाई हुई छापरियां (छोटी टोकरियां) सिर पर रख कर काफल तोड़ने के लिए चल पड़ी होंगी। काफल पकने की खबर देने के लिए ‘काफल-पाक्को’ चिड़िया पहुंच चुकी होगी। और, रात्ते ब्यान (एकदम [...]
फिर आम के नाम…
उर्फ बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह! छोटे मियां तो देश का नाम दुनिया में रौशन कर ही रहे हैं, बड़े मियां ने भी अपने हुनर का करिश्मा दिखा कर छोटे मियां के नाम एक आम कर दिया है। सुभान अल्लाह, बड़े मियां। मलिहाबाद के बड़े मियां पद्मश्री जनाब हाजी कलीम उल्ला खान कई साल [...]
आम : अतीत से आज तक-2
भारत से भले ही आम दुनिया भर में फैल गया, लेकिन आज भी दुनिया में इसकी सबसे अधिक खेती हमारे देश में ही की जाती है। इसकी एक से बढ़ कर एक किस्में हैं। और, वे एक-दो नहीं हजारों हैं। इतनी कि आम के नाम सुनोगे तो सुनते ही रह जावोगे। मुंह में पानी भर [...]

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