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हल्द्वानी में वे दिन
मैं कभी हल्द्वानी से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर पंतनगर विश्वविद्यालय में नौकरी करता था। हल्द्वानी आना-जाना होता रहता था क्योंकि खरीददारी के लिए वही निकटतम बड़ा बाजार था और वहीं से अपने गांव या नैनीताल के लिए बस पकड़ते थे। नगला से किसी बस में कूद-फांद कर हल्द्वानी में मंगलपड़ाव पर उतर जाते थे। आगे [...]
मेरा गांवः तब और अब-7
सन् पचास-पचपन में दुकान में रेडू (रेडियो) का डब्बा आया था। पता ही नहीं लगता था, कहां से कौन गा रहा है, कौन बोल रहा है। वह खबरें सुनाता था। तब थोड़ा-बहुत देश-दुनिया का हाल-समाचार मिलने लगा। अब तो कई घरों में टेलीविजन का डब्बा आ गया है। दीन-दुनिया की खबरें सुन लो या नाच-गाना [...]
मेरा गांवः तब और अब-6
जिन बच्चों ने तब पाटी में लिखना सीखा था, उनमें से कुछ पढ़-लिख कर नौकरी करने लगे। हमारे गांव में सबसे पहले ददा दीवान सिंह मेवाड़ी ने पढ़ा। उन्होंने अल्मोड़ा जाकर जे टी सी की पढ़ाई की। फिर इसी गलनी के जूनियर हाईस्कूल में नौकरी शुरू की जो अब इंटरकालेज बन चुका है। उसके बाद [...]
मेरा गांवः तब और अब-5
हां, खाने के भांड़े-बर्तन जरूर बदल गए हैं। उन दिनों की कांसे की थाली-ब्याले, पीतल की थालियां-गिलास, कसौंड़ी (लोटा), घंटी, तांबे और पीतल की तौलियां, लकड़ी का ड्वाबा, पाली वगैरह दिखाई नहीं देते। उनकी जगह स्टील की थालियां, लोटे, गिलास, कटोरियां, चम्मचें दिखती हैं। ब्या-काजों में खल (आंगन) या खेत में घेरे में बैठ कर [...]
मेरा गांवः तब और अब-4
रही-कसर खनस्यूं की देशी शराब की दुकान ने पूरी कर दी। मोटर रोड से आना-जाना तो आसान हो ही गया , शराब की दुकानों से बोतल खरीद लाने का भी सुभीता हो गया। शराब से नाज-पानी के अलावा पुश्तैनी भांड़े-बर्तन भी गायब होने लगे। कितने बड़े-बड़े तांबे के तौले होते थे, तांबे और पीतल की [...]
मेरा गांवः तब और अब-3
नीचे गौला नदी के किनारे, खनस्यूं गांव से हमारे गांव तक मोटर रोड आ गई है। पहले गौला नदी को पैदल पार करके आना पड़ता था और गांव के पैताने से सीधी चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी। साल में बाकी समय तो चल कर गौला नदी को पार कर ही लेते थे लेकिन चैमास में इसे [...]
मेरा गांवः तब और अब-2
असल में पहले ऊपर पहाड़ पर घना वन था। बांज, रयांज, तिलौंज, खर्शू, बुरौंज (बुरोंश), लोध, अंयार, म्हेल, काफल वगैरह के खूब पेड़ थे। हरे-भरे झ्वात (झाड़ियां) होते थे। बांज के पेड़ा पर जब गुलाबी पल्वां (नव पल्लव) आते और बुरौंजों (बुरोंश) पर लाल फूल खिल जाते थे तो महराज देखते ही बनता था! और [...]
मेरा गांवः तब और अब
क्या कहा, कितना बदल गया है मेरा गांव इन चौंसठ सालों में? जमाना ही बदल गया ठैरा महराज। कहां वह गांव रह गया, कहां वे लोग। बुजुर्ग लोग तो खैर भी सही अपने-अपने बखत पर चले गए। रह गए बाल-बच्चे और उनके बच्चे। तो, वे भी बदले जमाने के हवा-पानी में पल-बढ़ रहे हैं। रही [...]
कौन कदंब
वही, जो हमारे प्राचीन साहित्य में श्रीकृष्ण का प्रिय वृक्ष माना गया है। और?, आज हमारे वनस्पति विज्ञानियों की भाषा में ऐंथोसिफेलस कदंबा कहलाता है। संस्कृत हो या हिंदी? बांगला हो या गुजराती और मराठी, इन सभी भाषाओं में यह कदंब ही कहलाता है। इतना ही नहीं? तमिल भाषी भी इसे कदंबा या वैल्लाइ और [...]
भालू से भिडंत
‘‘ददा हुए गंगा सिंह नयाल। तब चौबीस-पच्चीस के रहे होंगे। मुझसे चार-पांच साल बड़े थे। शिकार का उन्हें भी गजब ही शौक हुआ। एक दिन गांव से दो-तीन शिकारी निकले। सामने उस जंगल में शिकार करने। वहां सबने अपना-अपना रास्ता पकड़ा होगा। कोई इधर को गया, कोई उधर को। ददा कुजा की झाड़ियों में झुक-झुक [...]

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