मां कहती थी, एक बहू थी। वह बहुत दिनों से अपने मायके नहीं गई थी। जब भी अपनी सास से मायके जाने के लिए कहती, सास उसे खूब अनाज देकर कहती- पहले इसे बीन कर साफ करो। फिर जावोगी मायके।…बेचारी सुबह से शाम तक अनाज को बीनती, सूप से फटकती और बांस की डालियों में भरती लेकिन काम फिर भी पूरा नहीं होता। अगली सुबह सास फिर ढेर सारा अनाज आंगन में रख देती और कहती- ले, बहू इसे बीन। इसके बाद जाएगी अपने ससुराल।
बेचारी बहू क्या करती? रो-रो कर फिर अनाज बीनने में लग जाती। सूरज पूरे आकाश को पार करके पश्चिम में पहुंच जाता। फिर पहाड़ों के पार छिप जाता। अनाज बीनने का काम फिर भी पूरा नहीं होता। बहू रात भर मायके जाने का सपना देखती। लेकिन, सुबह होते ही सास फिर बीनने के लिए अनाज सौंप देती। दुखियारी बहू फिर दिन भर अनाज बीनती।
गौरेयाओं से बहू का दुःख देखा नहीं गया। एक दिन, सुबह-सुबह उन्होंने बहू से पूछ लिया- दीदी, तुम रोती क्यों रहती हो? बहू ने पूरी बात बताई तो गौरेयां सास की चालाकी समझ गईं। वे बहू से बोलीं- चिड़िक…चिड़िक! रोओ मत। हम सब तुम्हारी मदद करेंगी। शाम तक यह सारा अनाज बीन देंगीं। तब तो तुम्हारी सास तुम्हें मायके जाने देगी?
बहू ने कहा- हां तब तो जाने देंगी।
गौरेयाओं ने आपस में बात की- चिडिक-चिडिक! चीं-चीं! और, फिर बहू के साथ अनाज बीनने में जुट गईं। अनाज चुन-चुन कर एक ओर करने लगीं और कूड़ा-करकट दूसरी ओर।सूरज ढलने से पहले ही अनाज बीनने का काम पूरा हो गया। गौरेयाओं ने चहक कर बहू से कहा- चिड़िक-चिड़िक! देखो काम पूरा हो गया।
बहू के मायूस मुंह पर मुस्कुराहट आ गई। उसने गौरेयाओं को प्यार से पुचकारा। मदद करने के लिए धन्यवाद दिया।
सास आई। उसने देखा कि हें, बहू ने काम तो पूरा कर दिया है! उसने खुश होकर बहू को गले लगा लिया। बोली- मैंने तुझे बहुत काम देकर परेशान किया। फिर भी तूने मन लगा कर काम किया। दिन भर में पूरा अनाज बीन दिया। बहू, कल सुबह तू मायके चली जाना।
सुबह हुई। बहू अपने मायके को चल पड़ी। उसे गौरेयाओं ने देखा। उसने गौरेयाओं को देखा। गौरेयां चहकती हुईं बड़ी दूर तक बहू के साथ गईं। फिर बहू ने प्यार से उनसे लौट जाने को कहा। तब गौरयां लौट गईं।
मतलब यह कि रोजमर्रा की जिंदगी में ही नहीं, कथा-कहानियों में भी हमसे सदा जुड़ी हुई थीं गौरेयां। विश्व गौरेयां दिवस (20 मार्च) को दिन भर आती-जाती गौरेयाओं को देख कर यही सब कुछ सोचता रहा मैं। हां, सुबह उनके आने से पहले अपनी बालकनी में मैंने गमलों के बीच उनके लिए पानी और बाजरे के बीजों की दावत सजा दी थी। वे दिन भर खाती, पीती और चहकती रहीं। मेरे कानों में अपना संगीत घोलती रहीं।


मोहक कहानी!
घुघूती बासूती
Devand sir that was really an interesting story.
Recently my Professor gave an assignment of collecting some data about the common sparrow more my locality.
While searching about this bird on google I came across this article of yours.
your article has really inspired me.
Keep writing!
बहुत रोचक ..यह कहानी भारत के एक बड़े भूभाग में ऐसे ही कही जाती है जो निश्चित ही सास बहू
के सम्बन्धों पर एक दास्ताँ है =एक कानी गौरैया का भी उल्लेख है जिसने चावल का एक दाना अपनी आँख में छुपा लिया था
और कहानी और भी रोमांच और द्वैध भरे हो गयी थी …..
बहरहाल अब तो गौरैया फुर्र हो चली है ….
good story
बहुत धन्यचवाद अरविंद जी, आपने मेरी गौरेया कथा पढ़ी। आप जैसे साथी की राय से मुझे बहुत प्रोत्साहन मिलता है।
धन्यवाद रविंदर।