‘‘ददा हुए गंगा सिंह नयाल। तब चौबीस-पच्चीस के रहे होंगे। मुझसे चार-पांच साल बड़े थे। शिकार का उन्हें भी गजब ही शौक हुआ। एक दिन गांव से दो-तीन शिकारी निकले। सामने उस जंगल में शिकार करने। वहां सबने अपना-अपना रास्ता पकड़ा होगा। कोई इधर को गया, कोई उधर को। ददा कुजा की झाड़ियों में झुक-झुक कर आगे बढ़े। पीछे-पीछे पछेटिया डुंगर सिंह। सामने कुछ दिखाई देने वाला नहीं हुआ। कुजा की एक घनी झाड़ी से बाहर निकले तो मुंह के सामने ही खम्म भालू खड़ा ठैरा। ददा ने भालू को देखा और भालू ने ददा को। भालू को रीस (गुस्सा) चढ़ गई। उसने ददा के हाथ से छीनी बंदूक और जमीन पर पटक दी। पछेटिया की ओर भी देखता जा रहा था कि कहीं वह तो कुछ नहीं कर रहा है। लेकिन , हल्ला मचाने या चीखने-चिल्लाने के बजाय पछेटिया ने तो उल्टे पैर पीछे को दौड़ लगा दी।
‘‘अच्छा , फिर? ’’
‘‘फिर क्या? भालू मुंह नोचने के लिए झपटा। बहुत तीखे नाखून होते हैं उसके। ददा ने मुंह मोड़ लिया तो कंधे में दांत बुड़ा (गड़ा) दिए। वह तो बुरी तरह कपोर (नोच) देता लेकिन दांत काम ही नहीं आए… ’’
‘‘क्यों? ’’
‘‘क्योंकि ददा ने वास्कट और स्वेटर-कमीज पहनी थी। भालू ने कंधे में दांत गड़ाए तो जाने कैसा जो हुआ , वे कपड़ों में ही अलजी (उलझ) गए। भालू थुथमुर (थूथन) को बाहर निकालने के लिए अपना मुंह झिंझोड़ता रहा लेकिन स्वेटर , वास्कट में से दांत नहीं छूटे। नहीं तो बहुत काट देता वह। ददा कहते थे जब उन्होंने देखा भालू का मुंह नहीं छूट रहा है तो वे भी चिपट गए उससे। हाथों से पट्ट जकड़ लिया भालू को। उन दिनों बदन में ताकत हुई ही। दोनों गुत्थम-गुत्था हो कर गिर पड़े…. ’’
‘‘फिर ? ’’
‘‘पल्टियां खाने लगे। कभी ददा ऊपर तो कभी भालू ऊपर। ढलान में पलटते गए। पीठ में चोट लगती रही। एक जगह चट्टान आ गई। किस्मत की बात , भालू भारी हुआ , इसलिए वह नीचे आ गया। नीचे थे तीखे पत्थर। भालू भद्द नीचे गिरा पत्थरों पर और पीड़ा से गुगाट करता भाग खड़ा हुआ। ’’
पछेटिया ने लोगों को बता दिया था कि ददा को भालू ने पकड़ लिया है। गांव के लोग जंगल में पहुंचे। ददा बुरी तरह घायल हो गए थे। लोग उन्हें दरी में लपेट कर घर लाए। फिर चारपाई में लिटा कर मुक्तेश्वर अस्पताल में ले गए। वहां काफी समय तक इलाज चला। धीरे-धीरे घाव भर गए और ददा ठीक होकर घर आ गए। ऐसी बात हुई!
हमने उनके किस्से सुने , जागनेल खाए , चाय पी और पैंलाग कह कर लौट आए।


वाह। कुछ और किस्से सुनाइये जी।
पढ़कर गाँव की याद ताजा हो गई.