आज लुइजे ब्राउन का जन्म दिन है। वह दुनिया की पहली परखनली शिशु यानी टेस्ट ट्यूब बेबी है, इसलिए एक बेशकीमती वैज्ञानिक उपलब्धि भी है। लुइजे विज्ञान के वरदान का जीता-जागता, हंसता-खिलखिलाता उदाहरण है। 25 जुलाई 1978 को जब उसके जन्म की घोषणा हुई थी तो दुनिया भर में तहलका मच गया था। सन् 60 के दशक से ही यह बहस छिड़ी हुई थी कि परखनली शिशु पैदा करना संभव भी हो सकेगा या नहीं? क्या वैज्ञानिक‘‘ईश्वर’ का काम करेंगे? जीवन को जन्म देंगे? मुझे याद है, ‘टेस्ट ट्यूब बेबी’ को इन्हीं संभावनाओं पर उस समय की लोकप्रिय विज्ञान पत्रिका ‘ साइंस टुडे’ ने विशेषांक प्रकाशित किया था।
जब शरीर क्रिया विज्ञानी राबर्ट एडवर्ड्स और प्रसूति विज्ञानी पेट्रिक स्टेप्टो ने इंगलैंड के ओल्डहाम एंड डिस्ट्रिक्ट जनरल हास्पिटल में सीजेरियन ऑपरेशन से 2-61 किग्रा. भारी लुइजे ब्राउन के जन्म की घोषणा की थी तो संभव-असंभव की अटकलें समाप्त हो गईं और विश्व भर में करोड़ों सूनी कोखों के भरने की नई आशा जाग उठी। लुइजे ब्राउन की मां लेज्ली और पिता जॉन को भी वह नौ साल बाद मिल सकी। वह भी गर्भाधान की नई आइ वी एफ तकनीक से। आज विश्व भर में इस तकनीक से 30 लाख से भी अधिक परखनली शिशु जन्म ले चुके हैं। भारत में भी सैकड़ों परखनली शिशुओं का जन्म हो चुका है।
विश्व में एक नया वैज्ञानिक‘‘अजूबा’ होने के बावजूद लुइजे ब्राउन सामान्य रूप से पली-बढ़ी। सन् 2004 में उसने मुलिंडर से शादी की और सन् 2006 में कैमरून को जन्म दिया। कैमरून लुइजे का बेटा है। लुइजे ब्राउन की मां लेज्ली ने सन् 1982 में एक और परखनली शिशु नताली ब्राउन को जन्म दिया जिसने सन् 1999 में प्राकृतिक रूप से एक बच्चे को जन्म दिया। वह प्राकृतिक रूप से मां बनने वाली विश्व की पहली परखनली शिशु है।
आज यह सब कितना सहज लगता है! सन् 1978 में जयों ही मैंने रेडियो पर विश्व के प्रथम परखनली शिशु के जन्म की खबर सुनी, मैं इस अद्भुत घटना पर तत्काल लेख लिखने में जुट गया था। मैंने ‘रविवार’ साप्ताहिक के संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह को तार भेजा-‘‘आर्टिकल ऑन टेस्टट्यूब बेबी फाॅलोज’ और अगले ही दिन लेख डाक से कलकत्ता भेज दिया। तब न ई-मेल थी, न कूरियर सेवा। पत्रिका से लेख मिलने की सूचना आ गई। ‘रविवार’ 20 अगस्त 1978 अंक में लेख छप गया-‘‘ऐसे जन्मता है परखनली शिशु’।
उधर‘‘धर्मयुग’ से बाल विशेषांक के लिए परखनली शिशु पर तुरंत लेख भेजने का पत्र मिला। ‘ धर्मयुग’ के 12 नवंबर 1978 अंक में‘‘परखनली शिशुःआगे-आगे देखिए होता है क्या! ’ रंगीन चित्रों के साथ प्रकाशित हुआ। मनुष्य जन्म के पौराणिक संदर्भों के साथ ही मैंने‘‘इन विट्रो फर्टिलाइजेशन’ की विधि समझाई। कुछ यों लिखा था पहले परखनली शिशु पर वह पहला लेखः ‘आदम हुआ अधूरा। नींद में उसकी एक पसली निकाल कर बनाई हव्वा। इन्हें अदन के बाग में छोड़ दिया और आगाह किया कि सभी फल-फूल खा लेना मगर ज्ञान वृक्ष के सेब न छूना। लेकिन, चटोरी जीभ न मानी। सेब तोड़ा, खुद खाया और आदम को खिलाया। खफा हो गए खुदा और दोनों को धकेल दिया धरती में कि जाओ- शर्मो ह्या का पर्दा पहनो और बच्चे पैदा करो!…तो, साहिबान, कहते हैं, आदम और हव्वा मम्मी-पापा बन गए। उनके बच्चे हुए। बच्चों के बच्चे हुए और होते-होते दुनिया में आदमी की भरमार हो गई।…आदमी ने जब अपनी अक्ल से अपने जन्म के बारे में पता लगाना शुरू किया, तो इस नतीजे पर जा पहुंचा कि साहब, हम आदम की नहीं, बंदरों की संतानें हैं।….चलिए, बंदर ही सही, लेकिन ये बच्चे कहां से आते हैं?
आखिर इस बात का पता लग ही गया कि पिता के शुक्राणु और मां के डिंब के मिलन से संतान के जीवन की शुरूआत होती है।…मगर साहिबान, प्रकृति सभी पर मेहरबान नहीं होती। कई इंसान संतान का मुंह नहीं देख पाते। नर और नारी किसी में भी कमी हो सकती है।…वैज्ञानिक न जाने कब से सूनी कोख भरने के सपने देखते रहे हैं। अगर गोद में गर्भाधान न हो सके तो क्या यह परखनली में किया जा सकता है—-डॉक्टरों ने लेज्ली ब्राउन का डिंब निकाला और उनके पति गिलबर्ट जॉन ब्राउन के शुक्राणु से परखनली में गर्भाधान कराया। नन्हे निषेचित डिंब को श्रीमती ब्राउन की कोख में बैठा दिया। गर्भ ठहर गया और 25 जुलाई को भारतीय समय के अनुसार प्रातः 5 बज कर 17 मिनट पर विश्व के प्रथम परखनली शिशु के रूप में श्रीमती ब्राउन की बिटिया लुइजे का जन्म हो गया।’—–
हां तो साहिबान, वही लुइजे आज अपना बत्तीसवां जन्म दिन मना रही है। लुइजे के जन्म के साल भर बाद विश्व का पहला परखनली शिशु एलास्टेर मैक्डोनाल्ड पैदा हुआ। लेख के अंत में जो तब कहा था, वही आज भी कहना चाहता हूंः ‘—न जाने कितने सपने बुने हैं आदमी ने! और, खुदा झूठ न बुलवाए, सपनों को सच्चाई में भी बदला है इसने। कोई शक नहीं कि कल परखनलियों में बच्चे पैदा होने लगें और आदमी की कलम तैयार हो जाए! अब बताइए, यही कौन जानता था कत तक कि परखनली में इंसान का बीज बोया जा सकता है?’


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