आपने प्रेमचंद की कहानी ‘आत्माराम’ पढ़ी है? उस कहानी में महादेव सोनार हाथ में पिंजरा लिए चलता तो पिंजरे में बैठा मिट्ठू बोलता रहता- ‘सत् गुरुदत्त शिवदत्त दाता। राम के चरण में चित्त लागा!’ गांव के लोग सुनते तो उन्हे लग जाता कि भोर हो गई है।
हमारे समाज में कई मिट्ठू इसी तरह पिंजरों में कैद होकर आदमी की बोली बोलते रहे हैं। वह खुला आसमान, वे हवाएं, वे दिशाएं, वे खेत-खलिहान, वे बाग-बगीचे, वे जंगल सब छूट जाते हैं जिनमें कभी वे मिट्ठू मनमर्जी से अपने संगी-साथियों के साथ झुंड में उन्मुक्त उड़ान भरते थे। दाना चुगते थे और पेड़ की किसी कोटर में अपने चिचियाते चूजों के लिए चुग्गा लाते थे।…
वह सब-कुछ छूट गया। पिंजरे में कैद होकर क्या करते वे? आदमी की आवाज की नकल करने लगे। दाना-पानी देने वाले आदमी से ही लगाव हो गया। फिर वह ‘आत्माराम’ का महादेव सोनार हो, घर की कोई अम्मा-ताई, अब्बू-अम्मी या मालकिन सरोज?
सरोज? सरोज कौन?
दो साल पहले की ही तो बात है।…तारीख 13 सितंबर। पांच आतंकी विस्फोटों ने 24 जिंदगियां मिटा दीं। सौ-डेढ़ सौ लोगों को बुरी तरह जख्मी कर दिया और अपनों के बिछुड़ने के गम में या दहशत से न जाने किस-किस को मौन कर दिया।
दिल्ली में गफार मार्केट में हुए विस्फोट ने मिट्ठू को भी मौन कर दिया था। मिट्ठू गफार मार्केट की गली नं. 42 की सरोज का पालतू तोता था। नीम के पेड़ पर लटके अपने पिंजरे से हर रोज ‘कीयाक…कीयाक’ की आवाज में चहकते हुए चारों ओर की चहल-पहल को देखा करता था। उस दिन भी वह चहक रहा था कि अचानक भयानक बम विस्फोट हो गया। विस्फोट ने सरोज की जान ले ली। मिट्ठू ने अपने पिंजरे के भीतर से मौत का वह मंजर देखा। उसने अपनी आंखों के सामने अपनी मालकिन को मौत के मुंह में जाते देखा। देखा और मिट्ठू मौन हो गया। उसने अन्न-जल छोड़ दिया।
पिंजरे में पालने के लिए तोते ही सबसे अधिक पकड़े जाते हैं। उनका चटख रंग, चहकने का अंदाज और आवाजों की नकल उतारने की खासियत ही उनकी दुश्मन बन गई। सदियों से लोग इन्हें पिंजरों में पाल रहे हैं। पक्षी पकड़ने वाले बहेलिए निर्मम होकर घोंसलों में से तोतों के बच्चे पकड़ लाते हैं। सही ढंग से उड़ान भरने से पहले ही वे कैद कर दिए जाते हैं। उनकी पूरी जिंदगी पिंजरे में ही बीत जाती है। स्वयं अपने लिए आजादी चाहने वाला आदमी पिंजरे में कैद, अपने माता-पिता और संगी-साथियों से बिछुड़े पंछी का दर्द नहीं समझ पाता है। कुछ लोग तोते को सिखा-समझा कर कार्ड निकालने का धंधा शुरू कर देते हैं और लोगों को उनका झूठा भविष्य बताते हैं। बेचारे तोते को क्या पता कि किसका भविष्य क्या है।
प्रकृति ने तोते बनाए भी इतनी तरह के हैं कि उनके रंग-रूप पर रीझ-रीझ कर दुनिया के तमाम देशों में लोग सदियों से उन्हें पकड़ कर बेचते और पालते आ रहे हैं। भारत में ही इनकी कम से कम 13 प्रजातियां पाई जाती हैं। आस्ट्रेलिया, एशिया के काकातू हों या लाॅरीकीट अथवा चटख रंगों के दक्षिण व मध्य अमेरिका के मकाउ, ये सब हमारे तोतों के ही बिरादर हैं। काकतील छोटे आकार के और पीले सिर वाले आस्ट्रेलियाई तोते हैं।
पिछले दिनों अमेरिका के न्यूजर्सी राज्य की एक महिला एवलिन डेलियाॅन के काकातुआ तोते के बारे में पढ़ा था। घर भीतर से किसी महिला की मदद की गुहार सुनाई दी। पुलिस दरवाजा तोड़ कर भीतर पहुंची तो देखा वहां केवल काकातुआ था। वही महिला की आवाज की नकल उतार कर मदद के लिए चिल्ला रहा था। एक बार वह बच्चे की आवाज में इतना चीखा कि बाल कल्याण विभाग के कर्मचारी मदद के लिए आ गए। डेलियाॅन ने हंसते हुए कहा कि उनका काकातुआ टी.वी. देख कर अंग्रेजी और स्पेनिश में आवाजों की नकल उतारता रहता है।


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