यह सब तो ठीक, लेकिन वह चिड़िया क्यों कहती है, ‘‘ काफल पाक्को! काफल पाक्को!’’ दिन भर रट लगा देती है, बल्कि कई बार तो रात में नींद खुलने पर भी उसकी आवाज आती रहती है, ‘‘ काफल पाक्को! ’’ वह सोती नहीं क्या?
सोती है। लेकिन, ज्यादातर समय लगातार बासती (बोलती) रहती है, ‘‘काफल पाक्को! काफल पाक्को! ’’ दिल की बात हुई, कहती रहती है…कहती रहती है, जब तब जवाब न मिल जाए। असल में इधर काफल पकने लगते हैं और उधर काफल-पाक्को चिड़िया की प्रजनन ऋतु शुरु हो जाती है। वह कूज-कूज कर प्रेम का गीत गाती है। मार्च से अगस्त तक काफल-पाक्को चिड़िया का प्रजननकाल होता है। और, प्रजनन के बाद फिर क्या बोलना? वह मौन साध कर उन्हीं गिरि-काननों में रहती है या फिर सर्दियों में नीचे गर्म घाटियों की ओर उतर जाती है और चुपचाप कीड़े-मकोड़े खाकर अपने दिन बिताती है। लेकिन, अंडे और बच्चे?
आप सुनेंगे तो हैरान रह जाएंगे। प्यार में इतना पागलपन दिखाने वाली काफल-पाक्को चिड़िया भी कोयल, और कफुवा यानी कुक्कू की बिरादर है। उन्हीं की तरह यह प्यार करती है मगर अपने अंडे चोरी-छुपे काली-कलूटी ‘पहाड़ी भुजंगा ’ (ड्रोंगो) या काली-बसंती पीलक (ओरियोल) चिड़िया के घोंसले में दे देती है। वे बेचारी चिड़ियां इसके अंडों को अपने अंडे समझ कर ममता की छांव देती हैं। बच्चों को पालती हैं। और, बच्चे जब उड़ने लायक हो जाते हैं तो उड़ कर अपनों के पास पहुंच जाते हैं। प्रकृति ने ऐसा क्यों किया होगा? कोयल, कफुवा, काफल-पाक्को के कंठ में सुरीला सुर तो भर दिया मगर हृदय में ममता की भावना नहीं भरी। भुजंगा और पीलक तो बस धाय मां बन कर रह जाती हैं जिन्हें बाद में काफल-पाक्को के बच्चे पहचानते तक नहीं हैं।
पहले कहां पता था यह सब। बचपन से काफल-पाक्को की ‘काफल पाक्को!’ और कफुवा की ‘कुक्कू! कुक्कू’ सुनता रहा। अब जान सका हूं कि हमारी काफल-पाक्को चिड़िया को अंग्रेजी में ‘इंडियन कुक्कू’ कहते हैं और हमारे कफुवा का नाम है ‘कामन कक्कू’। वैज्ञानिक भाषा में काफल-पाक्को का नाम कुकुलस माइक्रोप्टेरस है। कफुवा का नाम कुकुलस केनोरस है। और हां वनस्पति विज्ञानियों ने हमारे काफल का नामकरण किया है- माइरिका नागी।
जनजीवन में रसा-बसा रसीला काफल हमारे लोकगीतों और लोक कथाओं में भी खूब फला-फूला है। ‘काफल पाक्को, मैंलि नें चाक्खो’ (काफल पका पर मैंने नहीं चखा) लोककथा सुन कर आंखें भर आती हैं। सुनेंगे आप?
—कहते हैं, दूर पहाड़ में जंगल से एक मां टोकरी भर काफल तोड़ लाई। उसने काफल ‘माना’ से माप कर अपनी बेटी को दिए और कहा, इन्हें चखना-खाना मत। संभाल कर रखना। वह फिर घर बाहर के कामों में लग गई। शाम को लौटी तो देखा, काफल कम हो गए हैं। उसने सोचा बेटी ने कहना नहीं माना और काफल खा दिए। गुस्से में आव देखा न ताव, बेटी को बुरी तरह पीट दिया। बेटी ने काफल छुए भी नहीं थे। दिन भर की भूखी-प्यासी बेटी मार नहीं सह पाई। उसके प्राण पखेरु उड़ गए। मरने के बाद वह काफल-पाक्को चिड़िया बन गई।
देर शाम झुरझुर बारिश हो गई। हवा में नमी बढ़ गई। मां ने काफलों की तरफ देखा तो देखती रह गई। काफल तो पूरे के पूरे ही थे। वह समझ गई। समझ गई कि दिन की गर्मी से रसीले काफल मुरझा कर सिकुड़ गए। नमी मिली तो वे फिर फैल कर पूरे हो गए। कपाल पर दो हत्थड़ मार कर वह चिल्लाई- मैंने अपनी पोथी खाली मार दी। उसने काफल नहीं खाए थे। पोथी, काफल तो पूरे हैं! पूरे हैं!
रोते-रोते उसके भी प्राण पखेरु उड़ गए।
मरने के बाद मां भी चिड़िया बन गई। चैत का महीना आता है। काफल पकने लगते हैं तो काफल-पाक्को भी आ जाती है और कहती है….काफल पाक्को! मैंलि नें चाक्खो!
हमारे धुर-जंगलों, लोक गीतों और लोककथाओं का रसीला काफल हरा-भरा बना रहे और खूब फल-फूल कर हमारे जीवन में रसता-बसता रहे, यही कामना है।


मार्मिक।