वही, जो हमारे प्राचीन साहित्य में श्रीकृष्ण का प्रिय वृक्ष माना गया है। और?, आज हमारे वनस्पति विज्ञानियों की भाषा में ऐंथोसिफेलस कदंबा कहलाता है। संस्कृत हो या हिंदी? बांगला हो या गुजराती और मराठी, इन सभी भाषाओं में यह कदंब ही कहलाता है। इतना ही नहीं? तमिल भाषी भी इसे कदंबा या वैल्लाइ और तेलगु भाषी कदंबामु बोलते हैं।
कहते हैं, लगभग 2000 वर्ष पहले मथुरा और भरतपुर के बीच वृंदावन क्षेत्र में कदंब के विशाल वन थे। आज भी उस क्षेत्र में यहां वहां कदंब के पेड़ उन सघन वनों की याद दिलाते हैं।
कदंब का पौधा रोपने के बाद 6 से 80 साल तक तेजी से बढ़ता है। फिर धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। इसके पेड़ 30 फुट तक ऊंचे और तने की मोटाई 5 से 7 फुट तक हो सकती है। कदंब की शाखाएं नीचे को झुकी हुई होती हैं। पत्तियां पांच-सात इंच लंबी होती है। वर्षा ऋतु में शाखों के सिरों पर गोल गेंदनुमा सुनहरे फूल खिल उठते हैं जो महिलाओं के जूड़े की भी शोभा बढ़ाते हैं। कदंब के फूलों से भीनी-भीनी सुगंध निकलती है। जिससे वे परागण के लिए कीट-पतंगों को मौन निमंत्रण देते हैं।
कदंब के वृक्ष में कीट-पतंगों से लेकर चिड़ियों और गिलहरियों तक का संसार बसता है। कभी इसके तने पर पीठ टिका कर इसकी छांव में तो बैठ कर देखिए। देखिए, अपनी शीतल छांव में यह आपको कितना सुकून देता है।


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